
तं पुण णिरुद्धजोगो सरीरतियणासणं करेमाणो ।
सवण्हु अपडिवादी ज्झायदि ज्झाणं चरिमसुक्कं॥1896॥
योग निरोध करें वे जिनवर तीनों तन का करें विनाश ।
अप्रतिपाती चरम ध्यान कर, कर्म अघाति करें विनाश॥1896॥
अन्वयार्थ : कैसा है चौथा शुक्लध्यान ? अवितर्क/श्रुत के अवलंबनरहित है । अविचार अर्थात् पदार्थ, व्यंजन, योग इनकी पलटन रहित है, क्योंकि ये दोनों ध्यान भगवान केवली की आयु के अन्तर्मुहूर्त काल अवशेष रहने पर होते हैं, इसलिए केवली के ये सम्पूर्ण आवरण के अभाव से समस्त पदार्थ को एक समय में ही जानते हैं, तब श्रुत का अवलंबन नहीं है और अर्थ, व्यंजन, योगों का पलटना भी नहीं है । इनका पलटना तो जिसे क्रमवर्ती ज्ञान होता है, उनके होता है और समस्त कर्म का नाश किये बिना फिरता नहीं, इसलिए अनिवृत्ति कहते हैं । श्वासोच्छ्वासादि समस्त मन, वचन, काय के हलन-चलन से रहित हैं, इसलिए समुच्छिन्नक्रिय कहो या अक्रिय कहो । सम्पूर्ण शीलगुणों के अधिपति/यथाख्यातचारित्र, उसका सहचारी ध्यान है, इसलिए ध्यान को शैलेश्य कहते हैं । समस्त योगों का निरोध हो गया है, इसके बाद और ध्यान नहीं, इसलिए इसको अपश्चिम कहते हैं । ऐसा सर्वोत्कृष्ट उत्तम ध्यान है । यह चतुर्थ ध्यान योगों के अभाव करने से होता है, अत: निरुद्धयोग है । औदारिक, तैजस, कार्मण शरीरों का नाश करने वाला है और यह उलटा/गिरता/छूटता नहीं है, इसलिए अप्रतिपाति है । इस चौथे शुक्लध्यान को सर्वज्ञ भगवान ध्याते हैं ।
सदासुखदासजी