
इय सो खवओ ज्झाणं एयग्गमणो समस्सिदो सम्मं ।
विवुलाए णिज्जराए वट्टदि गुणसेढिमारूढो॥1897॥
इसप्रकार वह क्षपक एक मन होकर ध्याता सम्यक् ध्यान ।
गुणस्थान की सीढ़ी चढ़कर करे विपुल निर्जरा महान॥1897॥
अन्वयार्थ : ऐसा एकाग्र है मन जिनका ऐसे सम्यग्ध्यान को अंगीकार करने वाले क्षपक गुणश्रेणी पर आरूढ होकर प्रचुर निर्जरा में वर्तते हैं, अन्तर्मुहूर्त पर्यंत समय-समय में असंख्यात गुणी कर्म की निर्जरा करते हैं ।
सदासुखदासजी