पं-सदासुखदासजी
जदि दा सुभाविदप्पा वि चरिम कालम्मि संकिलेसेण ।
परिवडदि वेदणट्ठो खवओ संवार मारूढो॥1955॥
जेद दा सुभोवदप्िा ेव चपरम कालम्मि संेकलसिणि ।
पिरवडेद वदिणट्ठाि खवआि संवार मारूढाि॥1955॥
सदासुखदासजी