ज्झायंतो अणगारो अट्टं रुद्दं च चरिमकालम्मि ।
जो जहइ सयं देहं सो ण लहइ सुग्गदिं खवओ॥1954॥
चरम समय में आर्त-रौद्र दुर्ध्यान पूर्वक जो अनगार ।
देह त्याग करते हैं वे मुनि कभी सुगति नहिं करते प्राप्त॥1954॥
अन्वयार्थ : जो क्षपक जीवन पर्यंत आराधना धारण करके भी मरण के अवसर में आर्त्तरौ द्रभाव पूर्वक शरीर को छोडते हैं, वे साधु सुगति को प्राप्त नहीं होते । आर्त्तर्-रौद्र भावों में मरण हो, उसकी सुगति कैसे होगी? नहीं होगी ।

  सदासुखदासजी