पं-सदासुखदासजी
गच्छंहि केइ पुरिसा पक्खी इव पंजरंतरणिरुद्धा ।
सरण पंजरचकिदा ओसण्णागा पविहरंति॥1957॥
जैसे कोई पथिक थक जाये, पक्षी कादव में धसता ।
शुद्ध मार्ग से भ्रष्ट हुआ अवसन्न क्षपक है उसे कहा॥1957॥
सदासुखदासजी