पं-सदासुखदासजी
अविसुद्दभावदोसा कसायवसगा य मंदसंवेगा ।
अच्चासादणसीसा मायाबहुला णिदाणकदा॥1958॥
रत्नत्रय में दोष, कषायाधीन मन्द संवेगी हैं ।
गुणी जनों का मान रखें नहिं माया बहुल, निदान करें॥1958॥
सदासुखदासजी