
असदि तणे चुण्णेहिं च केसरच्छारिट्ठियादिचुण्णेहिं ।
कादव्वोथ ककारो उवरिं हिट्ठा तकारो से॥1999॥
यदि तृण ना हो तो पत्थर के चूर्ण आदि या केशर से ।
ऊपर क, एवं नीचे त, इसप्रकार क्त, कार लिखें॥1999॥
अन्वयार्थ : यदि उस क्षेत्र में तृण न हो तो पुष्पों की केसर या भस्म या ईंटों का चूर्ण करके ऊपर ककार लिखना नीचे तकार लिखना और जो पीछी-कमंडल उपकरण हों तो उसको सम्यक् प्रति लेखन करके अर्पण कर दें, स्थापन कर दें । इसप्रकार मृतक क्षपक के स्थापन की विधि कही । पृष्ठ 61 पर - गणरक्षा के हेतु मध्यम नक्षत्र, का मरण होने पर तृण का एक प्रतिबिम्ब और उत्तम नक्षत्र में मरण होने पर तृण के दो प्रतिबिम्बों को मृतक के निकट द्वितीयोऽर्पित: - यह कहकर स्थापन कर देना चाहिए । यदि पीछी- कमण्डलु वहाँ उपलब्ध हों तो सम्यक् प्रकार से प्रतिलेखन करके उन सहित ही प्रतिबिम्बों का स्थापन करना चाहिए । प्रतिबिम्ब बनाने के लिये यदि वहाँ तृण न मिले तो तन्दुलों का चूर्ण, पुष्प की केशर, भस्म अथवा ईंटों के चूर्ण में से जो कुछ प्राप्त हो सके, उसके ऊपर ककार और उसके नीचे यकार अर्थात् "काय" शब्द लिख देना चाहिए और यदि वहाँ पीछी-कमण्डलु हों तो वे भी स्थापित कर देने चाहिए । संघ की शन्ति के लिये यह कार्य अवश्य करना चाहिए । शंका - क्या उपर्युक्त क्रिया करने से संकल्पी हिंसा का दोष नहीं लगता? समाधान - तृणमय पिण्ड में मृतक मुनि की स्थापना की जाती है, अत: संकल्पी हिंसा का दोष नहीं लगता । अभिप्राय यह है कि एक साथ दो शवों का एवं तीन शवों का दाह संस्कार किया जा रहा है । प्रकाशक - दि. जैन समाज, कलकत्ता वाली प्रति में गाथा नं. 1991-1992, में पृ. 754 पर भी पूर्वोक्त अर्थ ही लिखा है, विशेष कुछ नहीं । श्री अमितगति आचार्यकृत मरणकण्डिका ग्रन्थ में भी इसी प्रकार का उल्लेख है । सोलापुर से प्रकाशित ग्रन्थ में गाथा क्रमांक 1982 से 1985 तक यही शब्द दिये हैं, जो ग्रंथ में लिखे हैं । पृ. 865-866 पर है ।
सदासुखदासजी