+ अब संघ के मुनि वहाँ क्षपक की समाधिमरण करने की वसतिका में क्या करते हैं, यह कहते हैं - -
हमें प्राप्त हाि आराधन इस हतिु काय-उत्सर्ग करें ।
इच्छाकार एधष्ठाता सि करकि संघ वहाँ बैठि॥2001॥
हमें प्राप्त हो आराधन इस हेतु काय-उत्सर्ग करें ।
इच्छाकार अधिष्ठाता से करके संघ वहाँ बैठे॥2001॥
अन्वयार्थ : तींठा पाछै/शव को वसतिका में स्थापित करने के बाद समस्त संघ अपनी आराधना के लिये कायोत्सर्ग करे । जिसप्रकार इनकी आराधना हुई, उसी तरह हमारी भी आराधना होवे । इस अभिप्राय से समस्त संघ के साधु कायोत्सर्ग करते हैं और जिस वसतिका में क्षपक की आराधना हुई, उस वसतिका के अधिपति देवता को समस्त मुनि इच्छाकार करें । भो स्थान के स्वामी हो! आपकी इच्छा हो तो इस क्षेत्र में संघ रहने की इच्छा करता है, क्योंकि मुनीश्वरों का सदाकाल ऐसा ही आचार होता है । जिस वसतिकादि स्थान में प्रवेश करें, वहाँ तो ऐसा वचन कह कर प्रवेश करें । "युष्माकमिच्छया अत्रासितुमिच्छामि" भो स्थान के स्वामी हो! आपकी इच्छा से इस क्षेत्र में स्थिति - रहने की इच्छा करता हूँ और स्थान छोडकर जायें, तब आशीर्वाद देकर जायें । ऐसा नित्य ही नियोग है ।

  सदासुखदासजी