+ मङ्गलाचरण में जिनवाणी का गुणानुवाद -
(आर्या)
जयति जिनो धृतिधनुषा,-मिषुाला भवति योगियोधानाम् ।
यद्वाक्करुणामय्यपि, मोहरिपुप्रहतये तीक्ष्णा॥1॥
जिससे धैर्य-धनुषधारी योगी-भट करें मोह का नाश ।
जयवन्तो जिन, जिनकी वाणी, तीक्ष्ण बाण की पंक्ति समान॥
जिस जिनेन्द्र की दयामयी वाणी, धैर्यरूपी धनुष को धारण करने वाले
अन्वयार्थ : योगीरूपी योद्धाओं के मोहरूपी बैरी का नाश करने के लिए पैनी बाणों की पंक्ति के समान है - ऐसे वे जिनेन्द्र! इस संसार में सदा जयवन्त हैं ।