+ 'दानोपदेश' अधिकार का उपसंहार -
रत्नत्रयाऽभरण-वीर-मुनीन्द्र-पाद-,
पद्म-द्वय-स्मरण-संजनित-प्रभावः ।
श्रीपद्मनन्दि-मुनिराश्रित-युग्म-दान-,
पञ्चाशतं ललितवर्णचयं चकार॥54॥
रत्नत्रय-भूषित श्री वीरनन्दि के चरण-युगल का तेज ।
रचा दान-पञ्चाशत ललित पदों से पद्मनन्दि मुनि ने॥
अन्वयार्थ : आचार्यवर दानोपदेशरूप प्रकरण को पूर्ण करते हुए कहते हैं कि रत्नत्रयरूपी भूषण से भूषित ऐसे श्री वीरनन्दि नामक मुनीन्द्र के दोनों चरण-कमलों के स्मरण से जिसको उत्तम प्रभाव उत्पन्न हुआ है - ऐसे श्री पद्मनन्दि नामक मुनि द्वारा उत्तमोत्तम वर्णों की रचना से 54 श्लोकों में दान का प्रकरण पूर्ण हुआ ।