
दुर्गन्धाऽशुचिधातुभित्तिकलितं, संछादितं चर्मणा;
विण्मूत्रादिभृतं क्षुधादिविलसद्, दुःखाखुभिश्छिद्रितम् ।
क्लिष्टं कायकुटीरकं स्वयमपि, प्राप्तं जरावह्निना;
चेदेतत्तदपि स्थिरं शुचितरं, मूढो जनो मन्यते॥3॥
दुर्गन्धित अपवित्र धातुमय ढकी चर्म से है दीवार ।
क्षुधा-तृषा-दु:ख चूहों के बिल, मल-मूत्रादिक की भरमार॥
स्वयं दु:खमय काय कुटी यह, जरा अग्नि से घिरी हुई ।
तो भी इसे पवित्र और थिर, मान रहे हैं मूढ़मति॥
अन्वयार्थ : जिस देहरूपी झोपड़े की दीवारें, दुर्गन्धित और अपवित्र - ऐसी मल-मूत्र आदि तथा वीर्य-मज्जा-चर्बी आदि धातुओं की बनी हुई हैं । जो ऊपर से चाम से ढका हुआ है, लेकिन अन्दर विष्टा-मूत्र आदि से भरा हुआ है । भूख-प्यास आदि दुःखरूपी चूहों ने जिसमें बिल बना रखे हैं अर्थात् जो दुःखों का भण्डार है । वृद्धावस्थारूपी अग्नि, जिसके चारों ओर मौजूद है । ऐसे शरीररूपी झोपड़े को भी मूढ़ प्राणी अविनाशी तथा पवित्र मानते हैं - यह बड़े आश्चर्य की बात है ।