
अम्भोबुद्बुदसन्निभा तनुरियं, श्रीरिन्द्रजालोपमा;
दुर्वाताहत-वारिवाह-सदृशाः, कान्तार्थपुत्रादयः ।
सौख्यं वैषयिकं सदैव तरलं, मत्ताङ्गनाऽपाङ्गवत्;
तस्मादेतदुपप्लवाप्तिविषये, शोकेन किं किं मुदा॥4॥
यह तन जल के बुदबुद-सम है, इन्द्रजाल-सम लक्ष्मी जान ।
धन-सुत-मित्रादिक सब नश्वर, पवन-प्रताड़ित मेघ समान॥
विषयों का सुख भी चंचल है, नारी नेत्र-कटाक्ष समान ।
अत: प्राप्ति में हर्ष, बिछुड़ने पर क्यों शोक करें विद्वान्?॥
अन्वयार्थ : शरीर तो जल के बुलबुलों के समान है । लक्ष्मी इन्द्रजाल के समान है तथा स्त्री-धन-पुत्र-मित्र आदि, खोटे पवन से नष्ट हुए मेघों के समान पल भर में विनाशीक हैं । ये विषय सम्बन्धी सुख, युवती स्त्री के कटाक्ष के समान चंचल हैं । इसलिए आचार्य कहते हैं कि इनके नाश होने पर विद्वानों को न तो शोक करना चाहिए और न मिलने पर हर्ष मनाना चाहिए ।