+ एक गति से दूसरी गति में जाने के उदाहरण -
(शार्दूलविक्रीडित)
वृक्षाद्वृक्षमिवाण्डजा मधुलिहः, पुष्पाच्च पुष्पं यथा;
जीवा यान्ति भवाद्भवान्तरमिहा,ऽश्रान्तं तथा संसृतौ ।
तज्जातेऽथ मृतेऽथ वा न हि मुदं, शोकं न कस्मिन्नपि;
प्राय: प्रारभतेऽधिगम्य मतिमान्नस्थैर्यमित्यङ्गिनाम्॥19॥
वृक्ष-वृक्ष पर पक्षी उड़ते, पुष्प-पुष्प पर भ्रमर उड़ें ।
त्यों संसारी एक गति को, छोड़ भवान्तर में जायें॥
इस प्रकार जग के सब प्राणी, हैं अनियत जानें मतिमान् ।
जन्म-मरण में हर्ष-शोक, इसलिए करें न कभी विद्वान्॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार पक्षी, एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर तथा भौंरे, एक फूल से दूसरे फूल पर उड़ कर जाते हैं; उसी प्रकार इस संसार में अपने-अपने कर्म के वश से जीव, निरन्तर एक गति से दूसरी गति में जाते हैं । इस प्रकार प्राणियों की अनित्यता को समझ कर, विद्वान् प्रायः प्राणियों की उत्पत्ति में न तो हर्ष ही मानता है और न उनके मरने पर शोक ही करता है ।