+ पूर्वोपार्जित कर्म के अनुसार मरण समय निश्चित -
(वसन्ततिलका)
यैव स्वकर्मकृतकालकलात्र जन्तु:;
तत्रैव याति मरणं न पुरो न पश्चात् ।
मूढास्तथापि हि मृते स्वजने विधाय;
शोकं परं प्रचुरदुःखभुजो भवन्ति॥18॥
किया कर्म ने मरण सुनिश्चित, पहले-पीछे कभी न हो ।
किन्तु मूढ़-जन प्रिय-वियोग में, शोक करें अरु दु:ख भोगें॥
अन्वयार्थ : पूर्वोपार्जित अपने कर्मों के द्वारा जो मरण का समय निश्चित हो गया है, उसी के अनुसार प्राणी मरता है, आगे-पीछे नहीं मरता - ऐसा जान कर भी आत्मीय मनुष्य के मरने पर, अज्ञानीजन शोक करते हैं तथा नाना प्रकार के दुःखों को भोगते हैं ।