+ मृत्यु होने पर नयों की अपेक्षा भी शोक करना व्यर्थ -
(पृथ्वी)
स्थिरं सदपि सर्वदा, भृशमदेत्यवस्थान्तरैः;
प्रतिक्षणमिदं जगज्जलद-कूटवन्नश्यति ।
तदत्र भवमाश्रिते, मृतिमुपागते वा जने;
प्रियेऽपि किमहो मुदा, किमु शुचा प्रबुद्धात्मनः॥21॥
द्रव्यदृष्टि से जगत् नित्य है, पर अनित्य पर्यायों से ।
मेघपटलवत् प्रतिक्षण यह जग, उपजे अरु निश्चित विनशे॥
तो अपने प्रियजन के आने पर अथवा जाने पर रे! ।
क्यों प्रबुद्ध-जन हर्षित होवें, अथवा क्यों वे शोक करें॥
अन्वयार्थ : यद्यपि द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा यह लोक सदा विद्यमान है तो भी पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा मेघों के समूह के समान यह क्षण-क्षण में विनाशीक है । इसलिए हे बुद्धिमान् पुरुषों! इस संसार में अपने प्रिय मनुष्य के उत्पन्न होने पर हर्ष तथा मर जाने पर शोक करनें में क्या रखा है? अर्थात् तुम्हारा हर्ष तथा शोक करना बिना प्रयोजन का है ।