+ मरण के समय को देव भी निमिषमात्र टाल नहीं सकते -
(शार्दूलविक्रीडित)
लङ्घयन्ते जलराशयः शिखरिणो, देशास्तटिन्यो जनै:;
सा वेला तु मृतेर्नृ-पक्ष्म-चलन,-स्तोकाऽपि देवैरपि ।
तत्कस्मिन्नपि संस्थिते सुखकरं, श्रेयो विहाय ध्रुवं;
कः सर्वत्र दुरन्तदुःखजनकं, शोकं विदध्यात्सुधीः॥22॥
महासिन्धु-गिरि पार करें नर, दूर देश में भी जायें ।
किन्तु मृत्यु के एक समय को, सुर-गण भी नहिं टाल सकें॥
तो प्रिय-जन वियोग होने पर, ऐसा कौन पुरुष मतिमान?
शोक करे नाना दु:खदायक, तजे सुखद कल्याण-निधान॥
मनुष्य, बड़े-बड़े समुद्रों को पार कर जाते हैं, बड़े-बड़े पर्वतों तथा देशों का उल्लंघन कर जाते हैं, विस्तृत नदियों को भी तिर जाते हैं; परन्तु मरण के समय तो मनुष्यों की तो क्या बात? देव भी निमिषमात्र के लिए नहीं टाल सकते हैं । इसलिए ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष होगा? जो अपने किसी प्रिय मनुष्य के मर जाने पर समस्त प्रकार के कल्याण को देने वाले उत्तम धर्म को न करके, नाना प्रकार के नरकादि दुःखों को
अन्वयार्थ : देने वाले शोक को करेगा?