+ तृतीय अधिकार 'अनित्य पञ्चाशत्' का उपसंहार -
पुत्रादिशोक-शिखि-शान्तिकरी यतीन्द्र!;
श्रीपद्मनन्दि-वदनाम्बुधरप्रसूतिः ।
सद्बोध-सस्य-जननी जयतादनित्य-;
पंचाशदुन्नतधियाममृतैकवृष्टिः॥55॥
(हरिगीतिका)
पद्मनन्दि यतीन्द्र श्रीमुख,-मेघ से झरती अहा ।
पुत्रादि इष्ट-वियोग-ज्वाला, को शमन करती सदा॥
सद्बोध-धान्योत्पन्न करती, जगत् में जयवन्त हो ।
अनित्य पञ्चाशत् सुजल,-वृष्टि सुधी के उर अहो॥
अन्वयार्थ : यतियों में उत्तम - ऐसे जो पद्मनन्दि नामक यति, उनका मुखरूपी जो मेघ, उससे पैदा हुई और श्रेष्ठ बोधरूपी धान्य को पैदा करने वाली तथा पुत्र आदि में फैली हुई शोकरूपी अग्नि को शान्त करने वाली - ऐसी यह 'अनित्य पंञ्चाशत्' रूपी जल की वृष्टि, सज्जनों के हृदय में सदा जयवन्त रहो ।