+ हे भव्य जीवों! धर्म में ही अपनी बुद्धि को लगाओ! -
(वसन्ततिलका)
लोका गृहप्रियतमासुतजीवितादि;
वाताहतध्वजपटाग्रचलं समस्तम् ।
व्यामोहमत्र परिहृत्य धनादिमित्रे;
धर्मे मतिं कुरुत किं बहुभिर्वचोभिः॥54॥
नारी-सुत-गृह-जीवनादि सब, पवन प्रताड़ित ध्वजा समान ।
अधिक कहें क्या मोह त्याग कर, धर्म करें सम्यक् मतिमान॥
अन्वयार्थ : हे भव्य जीवों! ये घर-स्त्री-पुत्र-जीवन आदि समस्त पदार्थ, पवन से ताड़ित ध्वजा के कपड़े के अग्र भाग के समान चंचल हैं । इसलिए अधिक कहाँ तक कहा जाए? धन-स्त्री-मित्र आदि में फैले हुए मोह को सर्वथा नाश कर, धर्म में ही अपनी बुद्धि को लगाओ ।