+ चैतन्यस्वरूप तेज मेरी रक्षा करे! -
खादिपंचकनिर्मुक्तं, कर्माष्टकविवर्जितम् ।
चिदात्मकं परं ज्योति:, वन्दे देवेन्द्रपूजितम् ॥2॥
अष्ट कर्मों से रहित, नभ आदि से भी भिन्न है ।
देवेन्द्र वन्दित ज्योति चिन्मय, परम को मम नमन है॥
अन्वयार्थ : जो चैतन्यरूप तेज, पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश और काल से सर्वथा भिन्न है, ज्ञानावरणादि कर्मों से रहित है और जिसकी बड़े-बड़े देव तथा इन्द्र आदि सदा पूजन करते हैं - ऐसा वह चैतन्यस्वरूप उत्कृष्ट तेज, मेरी रक्षा करे अर्थात् उस चैतन्यस्वरूप तेज को मस्तक झुका कर मैं नमस्कार करता हूँ ।