+ ज्ञानियों के द्वारा अनुभवगम्य चैतन्यस्वरूप आत्मा को नमस्कार! -
यदव्यक्तमबोधानां, व्यक्तं सद्बोधचक्षुषाम् ।
सारं यत्सर्ववस्तूनां, नमस्तस्यै चिदात्मने ॥3॥
सद्बोध चक्षु-गम्य जो, नहिं गम्य ज्ञान-विहीन को ।
सार है सब वस्तुओं में नमन उस चित् आत्म को॥
अन्वयार्थ : ज्ञानरहित अज्ञानी पुरुष, जिस चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनुभव नहीं कर सकते तथा अखण्ड ज्ञान के धारक ज्ञानी, जिसका सदा अनुभव करते हैं और समस्त पदार्थों में जो सारभूत हैं - ऐसे उस चैतन्यस्वरूप आत्मा को मैं मस्तक झुका कर नमस्कार करता हूँ ।