+ 'यति-भावनाष्टक' का निरन्तर तीनों काल पाठ करने की प्रेरणा -
पापारिक्षयकारि दातृ नृपति-स्वर्गाऽपवर्गश्रियं;
श्रीमत्पंकजनन्दिभिर्विरचितं, चिच्चेतनानन्दिभिः ।
भक्त्या यो यतिभावनाष्टकमिदं, भव्यस्त्रिसन्ध्यं पठेत्;
किं किं सिध्यति वाञ्छितं न भुवने, तस्यात्र पुण्यात्मनः ॥9॥
पाप-शत्रु का नाशक है जो, स्वर्ग-मोक्ष-लक्ष्मी-दाता ।
चिदानन्द के रसिक मुनीश्वर, पद्मनन्दि की यह रचना॥
'यति-भावना-अष्टक' को जो, भक्ति सहित त्रय काल पढ़ें ।
उस पुण्यात्मा को जग में नहिं, क्या-क्या इष्ट पदार्थ मिलें॥
अन्वयार्थ : यह 'यति-भावनाष्टक' समस्त पापरूपी वैरियों का नाश करने वाला है, राजलक्ष्मी तथा स्वर्ग-मोक्ष की लक्ष्मी को देने वाला है, इसकी रचना चैतन्यस्वरूप तत्त्व में आनन्द मानने वाले श्री पद्मनन्दि (पंकजनन्दि) मुनि ने की है - ऐसे 'यति-भावनाष्टक' को जो भव्य जीव, भक्तिपूर्वक तीनों काल पढ़ते हैं, उन भाग्यशाली भव्य जीवों को संसार में किन-किन इष्ट पदार्थों की प्राप्ति नहीं होती? अर्थात् समस्त इष्ट पदार्थ उनको सुलभता से मिल जाते हैं ।