+ उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप निजतत्त्व में ही रहने की भावना -
अन्तस्तत्त्वमुपाधिवर्जितमहं व्याहारवाच्यं परं;
ज्योतिर्यै: कलितं श्रुतं चयतिभि:, ते सन्तु नः शान्तये ।
येषां तत्सदनं तदेव शयनं, तत्सम्पदस्तत्सुखं;
तद्वृत्तिस्तदपि प्रियं तदखिल,-श्रेष्ठार्थसंसाधकम् ॥8॥
अहं शब्द से वाच्य उपाधि-विहीन अहो! यह अन्तस्तत्त्व !
परम-ज्योति को जिनने जाना, सुना किया उसका आश्रय॥
जिनका वही सदन है शय्या, सुख-सम्पति है वृत्ति वही ।
वही मनोरथ-सिद्धि-प्रदायक, मुझे शान्ति दें वही मुनी॥
अन्वयार्थ : जिसके साथ किसी प्रकार के कर्म का सम्बन्ध नहीं है तथा जो 'अहम्' शब्द से कहा जाता है - ऐसे उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप आत्मतत्त्व को जिन मुनीश्वरों ने जान लिया है, सुन लिया है, जिन योगीश्वरों के लिए वह निजतत्त्व ही एक मात्र रहने का स्थान है, वही शयन का स्थान है, वही श्रेष्ठ सम्पदा है, वही सुख है, वही वृत्ति है, वही प्रिय है तथा वही निजतत्त्व, जिन मुनियों को मनोवांछित पदार्थों का सिद्ध करने वाला है - वे यती मुझे शान्ति प्रदान करें ।