+ धर्म का स्वरूप -
सम्यग्दृग्बोध-चारित्र, -त्रितयं धर्म उच्यते ।
मुक्ते: पन्थाः स एव स्यात्, प्रमाणपरिनिष्ठितः ॥2॥
सुदृष्टि-बोध-चारित्रत्रय समुदाय ही बस धर्म है ।
प्रमाण से जो सिद्ध है, वह धर्म ही शिव-पन्थ है॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र - इन तीनों के समुदाय को धर्म कहते हैं । प्रमाण से निश्चित यह धर्म ही मोक्ष का मार्ग है ।