
रत्नत्रयात्मके मार्गे, संचरन्ति न ये जनाः ।
तेषां मोक्षपदं दूरं, भवेत् दीर्घतरो भवः ॥3॥
रत्नत्रयात्मक मार्ग में जो, पुरुष चलते हैं नहीं ।
दूर है शिवपद उन्हें, अति दीर्घ है संसार भी॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, इस सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रस्वरूप मोक्षमार्ग में गमन नहीं करते हैं, उनको कदापि मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और उनके लिए संसार दीर्घतर हो जाता है अर्थात् उनका संसार नहीं छूटता ।