+ अनेक पुण्यात्मा मिथ्यादृष्टियों की अपेक्षा एक अकेला सम्यग्दृष्टि श्रेष्ठ -
एकोऽप्यत्र करोति य: स्थितिमति,-प्रीत: शुचौ दर्शने;
स श्लाघ्य: खलु दु:खितोऽप्युदयतो, दुष्कर्मण: प्राणभृत् ।
अन्यै: किं प्रचुरैरपि प्रमुदितै, रत्यन्तदूरीकृत-;
स्फीताऽऽनन्दभरप्रदाऽमृतपथै:, मिथ्यापथे प्रस्थितै: ॥2॥
यदि कोई नर प्रीति सहित, सम्यग्दर्शन धारण करता ।
दु:खी रहे यदि पापोदय से, तो भी उसको श्लाघ्य कहा॥
मिथ्यापथगामी बहुसंख्यक, हों या अतिशय सुखी दिखें ।
फिर भी वे आनन्द-प्रदायक, शिवपथ से अति दूर रहें॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, खोटे कर्मोदय से दु:खी होने पर भी सन्तुष्ट होकर, अत्यन्त पवित्र सम्यग्दर्शन में निश्चल स्थिति करता है अर्थात् सम्यग्दर्शन को धारण करता है, वह अकेला ही अत्यन्त प्रशंसा के योग्य समझा जाता है; किन्तु जो अत्यन्त आनन्द को देने वाले सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग से बाह्य हैं, वर्तमान काल में शुभ कर्म के उदय से प्रसन्न हों अथवा ऐसे मिथ्या मार्ग में गमन करने वाले मिथ्यादृष्टि मनुष्य बहुत हों तो भी वे प्रशंसा के योग्य नहीं हैं ।