+ मोक्ष का बीज, सम्यग्दर्शन और संसार का बीज, मिथ्यादर्शन -
बीजं मोक्षतरोर्दृशं भवतरो:, मिथ्यात्वमाहुर्जिना:;
प्राप्तायां दृशि तन्मुमुक्षुभिरलं, यत्नो विधेयो बुधै: ।
संसारे बहुयोनिजालजटिले, भ्राम्यन् कुकर्माऽऽवृत:;
क्व प्राणी लभते महत्यपि गते, काले हितां तामिह ॥3॥
सम्यग्दर्शन बीज मोक्ष का, भवतरु का मिथ्यात्व कहें ।
अत: मुमुक्षु समकित पाकर, रक्षा हेतु प्रयत्न करें॥
विविध योनि से व्याप्त जगत में, कर्म सहित यह जीव भ्रमे ।
बहुत काल तक, किन्तु सुदृष्टि पाना उसको दुर्लभ है॥
अन्वयार्थ : मोक्षरूपी वृक्ष का बीज, सम्यग्दर्शन है तथा संसाररूपी वृक्ष का बीज, मिथ्यात्व है - ऐसा सर्वज्ञदेव ने कहा है । मोक्षाभिलाषी उत्तम पुरुषों को सम्यग्दर्शन प्राप्त होने पर उसकी रक्षा करने में अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि नरक, तिर्यंच आदि नाना प्रकार की योनियों से व्याप्त, इस संसार में अनादि काल से भ्रमण करता हुआ और खोटे कर्मों से युक्त यह प्राणी, बहुत काल के व्यतीत होने पर भी इस सम्यग्दर्शन को कहाँ पा सकता है ?