
ते चाऽणुव्रतधारिणोऽपि नियतं, यान्त्येव देवाऽऽलयं;
तिष्ठन्त्येव महर्द्धिकाऽमरपदं, तत्रैव लब्ध्वा चिरम् ।
अत्राऽऽगत्य पुन: कुलेऽतिमहति, प्राप्य प्रकृष्टं शुभात्-;
मानुष्यं च विरागतां च सकल,-त्यागं च मुक्तास्तत: ॥24॥
यदि वे अणुव्रत धारी हों तो, निश्चित सुरपद प्राप्त करें ।
वहाँ महान ऋद्धिधारक सुर, हो चिरकाल विलास करें॥
और पुन: शुभ-कर्म-योग से, नरगति उत्तम कुल पाते ।
सकल परिग्रह-त्याग विरागी, होकर मुक्तिपुरी जाते॥
अन्वयार्थ : जो षट् आवश्यकपूर्वक अणुव्रत को धारण करने वाले श्रावक हैं, वे नियम से स्वर्ग जाते हैं । वहाँ पर महान ऋद्धिधारी देव होकर, चिरकाल तक निवास करते हैं । पश्चात् वे इस मृत्यु लोक में आकर शुभकर्म के योग से अत्यन्त उत्तम कुल में मनुष्य जन्म पाकर तथा वैराग्य को धारण कर और समस्त बाह्य-अभ्यन्तर परिग्रह का नाश कर, सीधे सिद्धालय को पधारते हैं, वहाँ पर अनन्त सुख के भोगने वाले होते हैं । इस प्रकार जब अणुव्रत आदि भी मुक्ति के कारण हैं तो भव्यों को चाहिए कि वे षट् आवश्यकपूर्वक अणुव्रतों को प्रयत्नपूर्वक धारण करें ।