+ चैत्यालय का निर्माण करने के विशेष लाभ -
(शार्दूलविक्रीडित)
यात्राभि: स्नपनैर्महोत्सवशतै:, पूजाभिरुल्लोचकै:;
नैवेद्यैर्बलिभिर्ध्वजैश्च कलशै:, तौर्यत्रिकैर्जागरै: ।
घण्टाचामरदर्पणादिभिरपि, प्रस्तार्य शोभां परां;
भव्या: पुण्यमुपार्जयन्ति सततं, सत्यत्र चैत्यालये ॥23॥
(वीर छन्द)
यात्राओं अभिषेक तथा, पूजन-विधान उत्सव द्वारा ।
नृत्य-गीत-नैवेद्य तथा, घण्टा-चामर-दर्पण द्वारा॥
ध्वजा-कलश-आरोहण-उत्सव, से करते शोभा विस्तार ।
चैत्यालय के माध्यम से भवि, करें उपार्जन पुण्य अपार॥
अन्वयार्थ : इस संसार में चैत्यालय के होने पर भव्य जीव, यात्रा से, कलशाभिषेकों से, सैंकडों बडे उत्सवों से, पूजा तथा चाँदनियों से, नैवेद्य से, बलि से, ध्वजाओं के आरोपण से, कलशारोहण से, विशेष शब्दों के करने वाले बाजों से, घण्टा, चँवर, दर्पण आदि से उन चैत्यालयों की उत्कृष्ट शोभा को बढ़ा कर, पुण्य का संचय करते हैं । इसलिए भव्य जीवों को चैत्यालय का निर्माण अवश्य ही कराना चाहिए ।