+ अणुव्रत-महाव्रत धारण करने का फल मोक्ष या भोग-विलास? -
भव्यानामणुभिर्व्रतैरनणुभि:, साध्योऽत्र मोक्ष: परं;
नाऽन्यत्किञ्चिदिहैव निश्चयनयात्, जीव: सुखी जायते ।
सर्वं तु व्रतजातमीदृशधिया, साफल्यमेत्यऽन्यथा;
संसाराऽऽश्रयकारणं भवति यत्, तद्दु:खमेव स्फुटम् ॥26॥
भविजन अणुव्रत और महाव्रत, द्वारा शिवपद ही साधें ।
क्योंकि मोक्ष में जीव सुखी हो, अत: अन्य कुछ नहिं चाहें॥
व्रताचरण यदि मोक्ष-प्राप्ति के, लिए करें तो होय सफल ।
नहिं तो वे ही भव के कारण, अत: दु:खमय अरु निष्फल॥
अन्वयार्थ : भव्य जीव, अणुव्रत तथा महाव्रत को मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही धारण करते हैं; उनको धारण करने से उन्हें अन्य कोई भी वस्तु साध्य नहीं होती है क्योंकि निश्चयनय से जीव को सुख की प्राप्ति मोक्ष में ही होती है । मोक्ष की प्राप्ति के लिए जो अणुव्रत, महाव्रत आदि आचरण किये जाते हैं, वे ही सफल समझे जाते हैं । लेकिन जो व्रत, मोक्ष की प्राप्ति के लिए नहीं हैं, वे संसार के ही कारण हैं; दु:खस्वरूप ही हैं - यह भलीभाँति स्पष्ट है । इसलिए भव्य जीवों को मोक्ष के लिए ही व्रतों को धारण करना चाहिए ।