
नि:शेषाऽमरशेखराऽऽश्रितमणि,-श्रेण्यर्चिताङ्घ्रिद्वयं;
देवास्तेऽपि जिना यदुन्नतपद,-प्राप्त्यै यतन्ते तराम् ।
सर्वेषामुपरि प्रवृद्धपरम,-ज्ञानादिभि: क्षायिकै:;
युक्ता न व्यभिचारिभि: प्रतिदिनं, सिद्धान्नमामो वयम् ॥2॥
सुर-मुकुटों की मणि से जिनके, पूजित होते युगल-चरण ।
तीर्थंकर भी जिस उन्नत पद, पाने हेतु करें प्रयत्न॥
नहीं अन्य में अद्वितीय, कैवल्य आदि क्षायिक गुणखान ।
सर्वोत्कृष्ट वृद्धिंगत सिद्धों, को प्रतिदिन हम करें प्रणाम॥
अन्वयार्थ : समस्त प्रकार के देवों के मुकटों में लगी हुई मणि से जिनके चरणों के युग्म पूजित हैं - ऐसे उत्कृष्ट तीर्थंकर देव भी जिस सिद्धपद की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं; ऐसे समस्त लोक के शिखर पर विराजमान तथा कलंकरहित अत्यन्त विस्तीर्ण ज्ञान आदि क्षायिक गुणों के धारी सिद्धों को प्रतिदिन हम नमस्कार करते हैं ।