
ये लोकाऽग्रविलम्बिनस्तदधिकं, धर्मास्तिकायं विना;
नो याता: सहजस्थिराऽमललसद्, दृग्बोधसन्मूर्तय: ।
सम्प्राप्ता: कृतकृत्यतामसदृशा:, सिद्धा जगन्मंगलं;
नित्याऽऽनन्दसुधारसस्य च सदा, पात्राणि ते पान्तु व: ॥3॥
नहिं धर्मास्तिकाय है ऊपर, अत: विराजे हैं लोकाग्र ।
स्वाभाविक निश्चल अति निर्मल, दर्श-ज्ञान से हैं शोभित॥
प्राप्त किया कृतकृत्यपना, जो अनुपम जग-मंगलकारी ।
नित्यानन्द सुधारस-पात्र, करें रक्षा हम सब जन की॥
अन्वयार्थ : जो सिद्ध भगवान लोक के अग्र भाग में विराजमान हैं, जो धर्मास्तिकाय की सहायता से लोक के अग्र भाग में गये है, जिनका स्वरूप स्वाभाविक तथा निश्चल निर्मल ज्ञान-दर्शन से शोभायमान हैं, जो कृतकृत्य हैं, जिनकी उपमा को कोई भी धारण नहीं कर सकता, जो समस्त जगत् में मंगल करने वाले हैं तथा जो अविनाशी आनन्दरूपी अमृत के पात्र हैं - ऐसे सिद्ध भगवान, हमारी रक्षा करें अर्थात् सिद्ध भगवान को मेरा सदा नमस्कार है ।