+ मङ्गलाचरण में प्रभु के नाम-स्मरण एवं ध्यान की प्रेरणा -
(शार्दूलविक्रीडित)
यद्यानन्दनिधिं भवन्तममलं तत्त्वं मनो गाहते;
त्वन्नामस्मृतिलक्षणो यदि महा, मन्त्रोऽस्त्यनन्तप्रभ: ।
यानं च त्रितयात्मके यदि भवेत्, मार्गे भवद्दर्शिते;
को लोकेऽत्र सतामभीष्टविषये, विघ्नो जिनेश प्रभो ॥1॥
(वीर छन्द)
निर्मल आनन्दधाम आप में, यदि मन अवगाहन करता ।
तेज अनन्तस्वरूप आपका, नाम मन्त्र है जो रहता॥
यदि आपके रत्नत्रयमय, मोक्षमार्ग में गमन अहो !
उस सज्जन को इष्ट प्राप्ति में, जग में क्या हो विघ्न प्रभो !
अन्वयार्थ : हे जिनेश! हे प्रभो! यदि सज्जनों का मन अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग मल से रहित होकर तत्त्वस्वरूप वास्तविक आनन्द के निधान आपका अवगाहन (आश्रय) करता है; यदि उनके मन में आपका नामस्मरणरूप अनन्तप्रभा का धारी महामन्त्र मौजूद है तथा यदि आपसे प्रगट किये हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञानरूपी मोक्षमार्ग में उनका गमन है तो उन सज्जनों को अभीष्ट की प्राप्ति में किसी प्रकार का विघ्न नहीं आ सकता ।