
ते सिद्धा: परमेष्ठिनो न विषया, वाचामतस्तान् प्रति;
प्रायो वच्मि यदेव तत्खलु नमस्यालेख्यमालिख्यते ।
तन्नामापि मुदे स्मृतं तत इतो, भक्त्याऽथ वाचालित:;
तेषां स्तोत्रमिदं तथापि कृतवानम्भोजनन्दी मुनि: ॥29॥
वचन-विषय हैं नहीं, सिद्ध परमेष्ठी अशरीरी भगवान ।
अत: गुणों का वर्णन उनका, नभ में लेखन चित्र समान॥
फिर भी उनके नाम मात्र, सुमिरन से हो आनन्द ।
अत: भक्ति से पद्मनन्दि ने, स्तवन रचा होकर वाचाल॥
इस अधिकार को पूर्ण करते हुए अलौकिक गुण के धारी
अन्वयार्थ : भगवान सिद्ध परमेष्ठी, वचन के तो विषय ही नहीं हैं; इसलिए मैं जो कुछ उनके गुणों का स्तवन अथवा उनके विषय में कुछ वर्णन करना चाहता हूँ, वह आकाश में चित्रकारी करने के समान मालूम होता है । तो भी उन सिद्धों का स्मरण किया हुआ नाम भी हर्ष का करने वाला होता है, इस कारण भक्ति से वाचालित होकर इस पद्मनन्दि नामक मुनि ने उन सिद्धों की स्तुति की है ।