+ जिनेन्द्रदेव की सेवा करके संसाररूपी वैरी को जीतना आसान -
यद्येतस्य दृढ़ा मम स्थितिरभूत्, त्वत्सेवया निश्चितं;
त्रैलोक्येश बलीयसोऽपि हि कुत:, संसारशत्रोर्भयम् ।
प्राप्तस्याऽमृत-वर्ष-हर्ष-जनकं, सद्यन्त्र-धारा-गृहं;
पंुस: किं कुरुते शुचौ खरतरो, मध्याह्नकालऽऽतप: ॥3॥
यदि निश्चय से मुझे आपकी, सेवा में दृढ़ता जिनराज ।
तो अतिशय बलवान मोह-शत्रु से भय क्यों मुझको नाथ ?
अमृत-वर्षा-कारक फव्वारे से युक्त सदन वासी ।
नर को क्या कर सकता है प्रभु! प्रखर सूर्य आताप दु:खी॥
अन्वयार्थ : हे तीन लोक के ईश! निश्चय से आपकी सेवा में यदि मेरा दृढ़पना है तो मुझे अत्यन्त बलवान संसाररूपी वैरी को जीतना कोई कठिन बात नहीं क्योंकि जिस मनुष्य ने जल की वर्षा से हर्ष को उत्पन्न करने वाला उत्तम फव्वारे सहित घर प्राप्त कर लिया है, उस पुरुष को जेठ मास की अत्यन्त तीक्ष्ण दोपहर की धूप कुछ भी दु:खी नहीं कर सकती ।