
य: कश्चिन्निपुणो जगत्त्रयगता,ऽनर्थानशेषांश्चिरं;
साराऽसार-विवेचनैक-मनसा मीमांसते निस्तुषम् ।
तस्य त्वं परमेक एव भगवन्!, सारो ह्यसारं परं;
सर्वं मे भवदाश्रितस्य महती, तेनाऽभवन्निर्वृति: ॥4॥
कोई चतुर नर सार-असार, पदार्थ-विवेचक मन के द्वार ।
जग-त्रय के सारे पदार्थ का, हो निर्दोष करे सुविचार॥
भगवन्! उसके लिए आप ही, सारभूत हैं अन्य असार ।
अत: आपकी शरण प्राप्त कर, मुझको होता सौख्य अपार॥
अन्वयार्थ : 'यह पदार्थ सार है और यह असार है' - इस प्रकार सार-असार की परीक्षा में एकचित्त होकर जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य तीनों लोक के समस्त पदार्थों का बाधारहित गहन दृष्टि से विचार करता है; उस पुरुष की दृष्टि में 'हे भगवन्! आप ही एक सारभूत पदार्थ हैं और आपसे भिन्न समस्त पदार्थ असारभूत ही हैं'; अत: आपके आश्रय से ही मुझे परम सन्तोष होता है ।