+ जगत् विनाशीक, अत: निर्विकार परमानन्द में ठहरने की प्रेरणा -
वात-व्याप्त-समुद्र-वारि-लहरी,-संघातवत् सर्वदा;
सर्वत्र क्षणभंगुरं जगदिदं, संचिन्त्य चेतो मम ।
सम्प्रत्येतदऽशेष-जन्म-जनक, व्यापार-पार-स्थितं;
स्थातुं वाञ्छति निर्विकारपरमानन्दे त्वयि बह्मणि ॥17॥
व्याप्त पवन से जल की लहरें, उठते हुए समुद्र समान ।
क्षणभंगुर सर्वत्र जगत् यह, भलीभँाति मन करे विचार॥
अब समस्त भव-सन्तति-उत्पादक व्यापारों से हो पार ।
निर्मल आनन्द ब्रह्म आप में, रमने को यह है तैयार॥
अन्वयार्थ : पवन से व्याप्त जल-लहरी के समूह समान सर्व काल तथा सर्व क्षेत्रों में यह जगत् क्षणभर में विनाशीक है - ऐसा भलीभाँति विचार कर मेरा मन, इस समय समस्त संसार के उत्पन्न करने वाले व्यापारों से रहित होकर, निर्विकार परमानन्द परमब्रह्मस्वरूप आप में ही ठहरने की इच्छा करता है ।