
सर्वेषामपि कर्मणामऽतितरां, मोहो बलीयानऽसौ;
धत्ते चंचलतां बिभेति च मृते:, तस्य प्रभावान्मन: ।
नो चेज्जीवति को म्रियेत क इह, द्रव्यत्वत: सर्वदा;
नानात्वं जगतो जिनेन्द्र! भवता, दृष्टं परं पर्ययै: ॥16॥
सब कर्मों में मोहकर्म यह, है अतिशय बलवान अरे !
मन चञ्चल इसके प्रभाव से, और मरण से सदा डरे॥
द्रव्यदृष्टि से कोई जग में, मरे न जीवे हे जिनदेव !
पर्यायार्थिकनय से विविध, प्रकार जगत को देखा देव !
अन्वयार्थ : ज्ञानावरण आदि समस्त कर्मों के मध्य में मोह ही अत्यन्त बलवान कर्म है । इसी के प्रभाव से यह मन, जहाँ-तहाँ चञ्चल होकर भ्रमण करता रहता है और मरण से डरता है । यदि यह मोह न होवे तो निश्चयनय से न तो कोई जीवे और न कोई मरे क्योंकि आपने जो इस जगत् को अनेक प्रकार देखा है, वह पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा से देखा है, द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा से नहीं; इसलिए हे भगवन्! मेरे इस मोह को सर्वथा नष्ट कीजिए ।