
यन्नान्तर्न बहि: स्थितं न च दिशि, स्थूलं न सूक्ष्मं पुमान्;
नैव स्त्री न नपुंसकं न गुरुतां, प्राप्तं न यल्लाघवम् ।
कर्म-स्पर्श-शरीर-गन्ध-गणना,-व्याहार-वर्णोज्झितं;
स्वच्छज्ञानदृगेकमूर्ति तदहं, ज्योति: परं नाऽपरम् ॥19॥
जो नहिं भीतर-बाहर और, दिशाओं में नहिं सूक्ष्म-स्थूल ।
स्त्री-पुरुष-नपंुसक भी नहिं, नहिं लघु अथवा नहीं गुरु॥
कर्म-स्पर्श-शरीर-गन्ध-संख्या अरु वचन-वर्ण-विरहित ।
स्वच्छ-ज्ञान-दृग-एक-मूर्ति मैं, परम-ज्योति हूँ अन्य नहीं॥
अन्वयार्थ : जो आत्मस्वरूप तेज न भीतर स्थित है, न बाहर स्थित है और न दिशा में ही स्थित है तथा न मोटा है, न पतला है । आत्मरूपी तेज न तो पुल्लिंग है, न स्त्रीलिंग है तथा नपुंसकलिंग भी नहीं है; न भारी है, न हल्का है । वह तेज, कर्म-स्पर्श-शरीर-गन्ध संख्या- वचन-वर्ण से रहित है । वह निर्मल है तथा सम्यग्ज्ञान-सम्यग्दर्शनस्वरूप है । उसी उत्कृष्ट तेजस्वरूप मैं भी हूँ, आत्मस्वरूप उत्कृष्ट तेज से भिन्न मैं नहीं हूँ ।