+ कर्मशून्य अवस्था की अपेक्षा आपकी और मेरी आत्मा में समानता -
एतेनैव चिदुन्नति-क्षय-कृता, कार्यं विना वैरिणा;
शश्वत्कर्मखलेन तिष्ठति कृतं, नाथाऽऽवयोरन्तरम् ।
एषोऽहं स च ते पुर: परिगतो, दुष्टोऽत्र नि:सार्यतां;
सद्रक्षेतर-निग्रहो नयवतो, धर्म: प्रभोरीदृश: ॥20॥
चेतन की उन्नति के घातक बिना प्रयोजन जो बैरी ।
मुझमें और आप में अन्तर किया दुष्ट कर्मों ने ही॥
मैं हूँ आप समक्ष अत: इन दुष्टों को प्रभु नष्ट करो॥
सज्जन-रक्षा दुष्ट-दण्ड यह नीतिवान का धर्म अहो॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! चैतन्य की उन्नति का नाश करने वाले और अकारण ही सदा वैरी बने इन दुष्ट कर्मों ने, आप में तथा मुझमें भेद डाल दिया है; किन्तु कर्मशून्य अवस्था की अपेक्षा जैसी आपकी आत्मा है, वैसी ही मेरी आत्मा है । इस समय ये कर्म, आपके सामने मौजूद हैं (आपको ज्ञात हो रहे हैं); इसलिए इस दुष्ट को हटा कर दूर करो क्योंकि नीतिवान् प्रभु का यही धर्म है कि वे सज्जनों की रक्षा करें तथा दुष्टों का नाश करें ।