
तत्त्वज्ञान-सुधार्णवं लहरिभि:, दूरं समुल्लासयन्;
तृष्णापत्र-विचित्र-चित्तकमले, संकोच-मुद्रां दधत् ।
सद्विद्याश्रित-भव्य-कैरवकुले, कुर्वन् विकासश्रियं;
योगीन्द्रोदयभूधरे विजयते, सद्बोध-चन्द्रोदय: ॥50॥
तत्त्वज्ञानमय सुधा-सिन्धु की, लहरों को उलसित करता ।
तृष्णा-पत्तों से विचित्र, चित्-कमल संकुचित कर देता॥
भव्यरूप कुमुदों को विकसित, करे सद्बोध-चन्द्रोदय ।
योगीन्द्रोदय पर्वत पर, होती है इसकी सदा विजय॥
अन्वयार्थ : श्रेष्ठ ज्ञानरूपी चन्द्रमा अथवा 'सद्बोध-चन्द्रोदय' नामक अधिकार, इस संसार में योगियों के जो इन्द्र अर्थात् बड़े-बड़े योगी, वे ही हुए उदयाचल, उनमें सदा जयवन्त है, यह 'सद्बोध-चन्द्रोदय' तत्त्वज्ञानरूपी जो समुद्र, उसको अपनी कल्लोलों से दूर तक उछालने वाला है; तथा तृष्णारूपी हैं पत्र जिसमें, ऐसे जो नाना प्रकार चित्तरूपी कमल, उनको संकुचित करने वाला है तथा श्रेष्ठ ज्ञान का आधारभूत जो भव्य जीवरूपी 'कैरव कुल' अर्थात् रात्रि-विकासी कमलों का समूह, उसका विकास करने वाला है ।