+ चैतन्यतत्त्व ही समस्त अभिलाषा-भय-भ्रम-दु:ख आदि का नाशक -
त्रैलोक्ये किमिहाऽस्ति कोऽपि स सुर:, किं वा नर: किं फणी;
यस्माद्भीर्मम यामि कातरतया, यस्याऽऽश्रयं चाऽपदि ।
उक्तं यत्परमेश्वरेण गुरुणा, नि:शेष-वाञ्छा-भयं;
भ्रान्तिक्लेशहरं हृदि स्फुरति चेत्, चितत्त्वमत्यद्भुतम् ॥49॥
जब तक अति अद्भुत निर्वाञ्छक, भय-भ्रम एवं दु:ख-विहीन ।
चेतनतत्त्व श्री गुरु-भाषित, उसमें चित्त निरन्तर लीन॥
तब तक त्रिभुवन में सुर नर या, सर्प कौन है हो सकता ।
जिससे डर कर या संकट में, मैं उसका आश्रय लेता॥
अन्वयार्थ : जो चैतन्यतत्त्व, समस्त प्रकार की अभिलाषा-भय-भ्रम तथा दु:खों को दूर करने वाला है और अत्यन्त आश्चर्य का करने वाला है - ऐसा परमेश्वर श्रीगुरु द्वारा कहा गया चैतन्यरूपी तत्त्व, यदि मेरे हृदय में स्फुरायमान है, मौजूद है तो तीन लोक में न कोई ऐसा देव है, जिससे मुझे भय होवे और न कोई ऐसा पुरुष या सर्प ही है, जिससे मैं डरूँ और कातर होकर, आपत्ति में किसी का सहारा ग्रहण करूँ ।