+ चैतन्यरूपी तेज हमारी रक्षा करे -
मनसोऽचिन्त्यं वाचा,-मगोचरं यन्महस्तनोर्भिन्नम् ।
स्वानुभव-मात्र-गम्यं, चिद्रूपममूर्त व्याद्व: ॥2॥
जो अचिन्त्य है मन से, वचन अगोचर तेज देह से भिन्न ।
सबकी रक्षा करे अमूर्तिक, चेतन मात्र स्वानुभव-गम्य॥
अन्वयार्थ : जिस चैतन्यरूपी तेज का मन से चिन्तवन नहीं कर सकते हैं, वाणी से भी वर्णन नहीं कर सकते हैं तथा जो शरीर से सर्वथा भिन्न और केवल स्वानुभव से ही जाना जाता है - ऐसा वह चैतन्यरूपी तेज हम लोगों की रक्षा करें ।