
वपुरादिपरित्यक्ते, मज्जत्यानन्दसागरे मनसि ।
प्रतिभाति यत्तदेकं, जयति परं चिन्मयं ज्योति: ॥3॥
देहादिक से मोह-त्याग, मन आनन्द-सागर में डूबे ।
भासित होता एक चिदातम, तेज जगत् जयवन्त रहे॥
अन्वयार्थ : शरीर, धन, धान्य आदि से रहित होने पर जिस समय चित्त, आनन्द-सागर में डूबता है; उस समय जो ज्योति मालूम पड़ती है, वह एक तथा चैतन्यस्वरूप उत्कृष्ट ज्योति इस संसार में जयवन्त रहे ।