
हिंसोज्झित एकाकी, सर्वोपद्रवसहो वनस्थोऽपि ।
तरुरिव नरो न सिध्यति, सम्यग्बोधादृते जातु ॥16॥
हिंसा त्याग बसे एकाकी, सर्व उपद्रव सहन करे ।
सम्यग्ज्ञान बिना वन में, तरुवत् नहिं सिद्धि प्राप्त करे॥
अन्वयार्थ : समस्त प्रकार की हिंसाओं से रहित, अकेला तथा समस्त उपद्रवों को सहन करने वाला मुनि, वृक्ष के समान वन में स्थित रहते हुए भी सम्यग्ज्ञान के बिना सिद्धत्व की प्राप्ति नहीं कर सकता ।