+ सम्यग्दर्शन से ही कर्मरूपी वैरियों का नाश -
विहिताभ्यासा बहिरर्थ,-वेध्यसम्बन्धतो दृगादिशरा: ।
सफला: शुद्धात्म-रणे, छिन्दित-कर्मारि-संघाता: ॥15॥
दर्शनादि बाणों से करते, बाह्य अर्थ छेदन अभ्यास ।
कर्म शत्रु का घात करें वे, आतम-रण में होंय सफल॥
अन्वयार्थ : बाह्य जो पदार्थ, वे ही हुए वेध्य 'निशान', उनके सम्बन्ध से किया गया है अभ्यास जिनका - ऐसे सम्यग्दर्शनादि बाण हैं, वे शुद्धात्मारूपी संग्राम में समस्त कर्मरूपी वैरियों को नाश कर सफल होते हैं ।