
शुद्धाच्छुद्धमशुद्धं, ध्यायन्नाप्नोत्यशुद्धमेव स्वम् ।
जनयति हेम्नो हैं, लोहाल्लौहं नर: कटकम् ॥18॥
शुद्ध लखे जो शुद्ध लहे, ध्याये अशुद्ध तो लहे अशुद्ध ।
स्वर्ण-पात्र ही बने स्वर्ण से, लौह-पात्र हो लोहे से॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार मनुष्य, सुवर्ण से सुवर्णय आभूषण आदि को ही बनाता है और लौह से लौहमय बर्तन आदि को ही बनाता है; उसी प्रकार जो मनुष्य, शुद्धात्मा का ध्यान करता है, उसको शुद्धात्मा की प्राप्ति होती है और जो मनुष्य, अशुद्ध आत्मा का ध्यान करता है, उसको अशुद्ध आत्मा की ही प्राप्ति होती है ।