+ चारित्रपूर्वक ही दर्शन-ज्ञान की शुद्धता -
सानुष्ठान-विशुद्धे, दृग्बोधे जृम्भिते कुतो जन्म ।
उदितेगभस्तिमालिनि, किं न विनश्यति तमो नैशम् ॥19॥
सूर्याेदय होने पर होता, अन्धकार का नाश स्वयं ।
चारित्र सहित दृग-ज्ञान विशुद्ध, तो कदापि न होय जनम॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार सूर्य का उदय होने पर रात्रि का अन्धकार नष्ट हो जाता है; उसी प्रकार जिस जीव के सम्यक्चारित्रसहित सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन विशुद्ध होते हैं, उसका जन्म कदापि नहीं हो सकता ।