
तं भव्वपोणंदी, तेयणिही णेसरुव्व णिद्दोसो ।
मोहंधयारहरणे, तुह पाया मम पसीयंतु ॥60॥
त्वं भव्यपद्मनन्दी, तेजोनिधि: सूर्यवन्निर्दोष: ।
मोहान्धकारहरणे, तव पादौ मम प्रसीदेताम्॥
तेज-निधि निर्दोष सूर्य, आनन्दित करते भव्य-कमल ।
मोह-तिमिर के नाश हेतु, होवें प्रसन्न तव चरण-युगल॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! आप भव्य कमलों को आनन्द देने वाले, तेज के निधान, निर्दोष सूर्य हैं; इसलिए मोहरूपी अन्धकार का नाश करने हेतु आपके चरण सदा प्रसन्न रहें ।