+ प्रभु-स्तवन करने में आचार्य की लघुता -
जत्थ असक्को सक्को, अणीसरो ईसरो फणीसो वि ।
तुह थोत्ते तत्थ कई, अहममई तं खमिज्जासु ॥59॥
यत्राशक्त: शक्तोऽनीश्वर: ईश्वर: फणीश्वरोऽपि ।
तव स्तोत्रे तत्र कवि:, अहममति: तत्क्षमस्व॥
इन्द्र-फणीन्द्र-महेश आदि भी, प्रभु-गुण-वर्णन में असमर्थ ।
अत: क्षमा कर दो हे प्रभुवर! मैं मति-हीन रचूँ स्तोत्र॥
अन्वयार्थ : हे गुणागार प्रभो! जब आपकी स्तुति करने में इन्द्र, महादेव और शेषनाग भी अशक्त हैं, तब आपकी स्तुति करने में मैं अल्पबुद्धि कवि क्या वस्तु हूँ? इसलिए मैंने जो भी आपकी स्तुति की है, उसे क्षमा करें ।