
दिट्ठे तुम्मि जिणवर, दिट्ठिहरासेसमोहतिमिरेण ।
तह णट्ठं जइ दिट्ठं, जहट्ठियं तं मए तच्चं ॥2॥
दृष्टे त्वयि जिनवर! दृष्टिहराशेषमोहतिमिरेण ।
तथा नष्टं यथा दृष्टं, यथास्थितं तन्मया तत्त्वम्॥
प्रभो! आपके दर्शन से यह, मोह-तिमिर ऐसा विघटा ।
जैसा वस्तु-स्वरूप जगत् का, वैसा मैंने देख लिया॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपको देखने पर दृष्टि को रोकने वाला मोहरूपी अन्धकार सर्वथा नष्ट हो गया है अर्थात् मैंने यथार्थ वस्तुस्वरूप देख लिया है ।